दौरे-जहाँ में कदम-बोशी नहीं हासिल यूँही,
कि हर कदम पे निशाँ छोड़े जा रहा हूँ,
यह जो डगर है, इस पर चलेगा जहाँ इक दिन,
कहेगा कलबिया, चले-चलो मैं आगे जा रहा हूँ!
हासिल करू रूहानी मिलकियत कभी,
ख्वाहिश यही ले चला इस सफ़र पर,
कुछ साथ हो चला खुद-ब-खुद,
धुल भी माथे को सजाती चली!
चिलमची कि ख्वाहिश पूरी हो किसी कि,
कि हम जहाँ मे आये नहीं इस खातिर,
कदम उठ चले हैं मंजिल के सरमाया,
राह कभी तो अंजाम को हासिल होगी!
रगों में साँसे भरती हैं हौसला,
नजरों में कोई लौ सी जली है,
नब्ज थामो तो रगों में लहू थमता नहीं,
मैं तो समय हूँ, रोक सकोगे किस जानिब!
December 16, 2009
November 11, 2009
कौन कहे और कासे कहें!
एक सुंदरी के गुजरते ही राजधानी क्षेत्र में हलचल न मचे ऐसा कैसे हो सकता है? भाई अब उम्र ही कुछ ऐसी है की दो-तीन साल में सीलिंग पार हो जायेंगे! मतलब छाडे-छाँट या खुल्ले सांड, और तब मोहल्ले की नवयौवनाएं हमारी बेबसी का खुलेआम कचूमर करती इठलाती हुई निकल जायेंगी और हम एक ठंडी साँस भर रह जायेंगे|
हमारी टोली के गणमान्य सदस्य जो अक्सर सिगरेट के धुएँ में छुपे रहते हैं, ऐसे मौकों पर ख़ुद-ब-ख़ुद उड़ते सफ़ेद धुएँ को मौके से ऐसे हवा कर देते हैं, जैसे उसका अस्तित्व कभी रहा ही न हो| इठलाती-बलखाती, एक हाथ से अपनी लटें संवारती और दुसरे हाथ से हवा में लहरें बनाती इस युवती की सभी अपनी-अपनी स्वप्नपरियों से तुलना करते हैं और निष्कर्ष के तौर पे, एक से लेकर दस तक अंक देना शुरू कर देते हैं| अंकतालिका में सात से ज्यादा अंक पाने वाली युवती को सभी एकमत होकर हर रोज बनने और बढती रहने वाली स्वप्न्सुन्दारियों की फेहरिस्त में शामिल कर लेते हैं|
यूँ ही राजधानी क्षेत्र में पाये जाने वाली हमारी टोली का दर्शन भी भाग्यवान लोगों या यूँ कहें की भागमतियों को ही हो पाता है| इस टोली के मुखिया हैं, कल्लू और उनके दर्शन का क्या कहना? बस उनकी बोली को आकाशवाणी माना जा सकता है, ख़ासकर रूप-बालाओं को लेकर| इन हजरत के बगैर शायद ही इस टोली का कोई अस्तित्व होता, हमारी टोली के अन्नदाता के तौर पर मशहूर और सच भी तो है यह! हमारी, शराबी और राजपूत की त्रिमूर्ति को परम ब्रह्म का रूप प्रदान करती अन्ना की मौजूदगी और उसमे प्राण फूंकती कल्लू की मुस्कान और तिरछी नजरें एक ऐसे दर्शन-शास्त्र को जीवंत-स्वरुप प्रदान करती है जिसको समझना बहुत टेडी खीर है| बातें ऐसी-ऐसी की बस हसी-ठहाकों से गुलजार हो जाता है राजधानी क्षेत्र| एक टीस मन में ही रह जाती है बस इन बातों का सफर यूँही दबा-छुपा न रह जाए, लेकिन आज की तारीख में सहनशील श्रवन कुमार कहाँ मिलते हैं? बस यही सोचता हूँ कि कौन कहे और कासे कहें!
हमारी टोली के गणमान्य सदस्य जो अक्सर सिगरेट के धुएँ में छुपे रहते हैं, ऐसे मौकों पर ख़ुद-ब-ख़ुद उड़ते सफ़ेद धुएँ को मौके से ऐसे हवा कर देते हैं, जैसे उसका अस्तित्व कभी रहा ही न हो| इठलाती-बलखाती, एक हाथ से अपनी लटें संवारती और दुसरे हाथ से हवा में लहरें बनाती इस युवती की सभी अपनी-अपनी स्वप्नपरियों से तुलना करते हैं और निष्कर्ष के तौर पे, एक से लेकर दस तक अंक देना शुरू कर देते हैं| अंकतालिका में सात से ज्यादा अंक पाने वाली युवती को सभी एकमत होकर हर रोज बनने और बढती रहने वाली स्वप्न्सुन्दारियों की फेहरिस्त में शामिल कर लेते हैं|
यूँ ही राजधानी क्षेत्र में पाये जाने वाली हमारी टोली का दर्शन भी भाग्यवान लोगों या यूँ कहें की भागमतियों को ही हो पाता है| इस टोली के मुखिया हैं, कल्लू और उनके दर्शन का क्या कहना? बस उनकी बोली को आकाशवाणी माना जा सकता है, ख़ासकर रूप-बालाओं को लेकर| इन हजरत के बगैर शायद ही इस टोली का कोई अस्तित्व होता, हमारी टोली के अन्नदाता के तौर पर मशहूर और सच भी तो है यह! हमारी, शराबी और राजपूत की त्रिमूर्ति को परम ब्रह्म का रूप प्रदान करती अन्ना की मौजूदगी और उसमे प्राण फूंकती कल्लू की मुस्कान और तिरछी नजरें एक ऐसे दर्शन-शास्त्र को जीवंत-स्वरुप प्रदान करती है जिसको समझना बहुत टेडी खीर है| बातें ऐसी-ऐसी की बस हसी-ठहाकों से गुलजार हो जाता है राजधानी क्षेत्र| एक टीस मन में ही रह जाती है बस इन बातों का सफर यूँही दबा-छुपा न रह जाए, लेकिन आज की तारीख में सहनशील श्रवन कुमार कहाँ मिलते हैं? बस यही सोचता हूँ कि कौन कहे और कासे कहें!
October 28, 2009
उम्मीद से !
का हो, कौन महिना चल रहा है? दादी के इस प्रश्न का उत्तर देने में थोडा सकुचाते हुए, रम्या बोली - सातवाँ| और रमुआ का गई, कित्तना महिना हो गईल? अबकी इस प्रश्न का उत्तर देने में रम्या के चेहरे का रंग उतर चुका था| और अब वो किसी और प्रश्न को सुनने की स्थिति-परिस्थति में ही नहीं थी|
रमुआ उपनाम है रमेश मेहतर का जो आज से आठ महिना पहले ही रात की काली स्याही में कहीं खो चुका है| लोग कहते हैं, सात महिना पहिले गाँव-मालिक और परिवार जनों की नजर बचा कर वो रम्या से मिलके गया है और उसी मिलन की निशानी, उसकी कोख में कभी मिलने और कभी न मिलने वाली सूखी-रोटी के पोषण में पल-बढ रही है| सच क्या है, रम्या भी शायद ही जानती है! सात माह पहले रोटी भूंजने को लकड़ी की तलाश में जंगल गई रम्या को बेहोशी की हालत में गाँव-मालिक के लठैत उसकी कोठरी में पटक गए थे| अब सच जो भी हो, रम्या का ध्यान रखना रमेश के बुढे माँ-बाप का फ़र्ज़ बन चुका था| लाठी टेकती अम्मा और फालिज़ पढने से वाम-अंग से अपंग हो चुके काठी मेहतर ही इस घर की मरजाद बचाए, मेहतरों के इस बस्ती में अपने आँगन में आने वाली एक नई पौध का इन्तेजार राम-राम, राधे-श्याम करते कर रहे थे| तिसपर कमर से झुक चुकी दादी का रोज-रोज आने वाली संतान के बारे में कई प्रश्नों के साथ आँगन बुहारना दिनचर्या बन चुका था|
रम्या अपने कोख में पलती इस निशानी को गिराने का असफल प्रयत्न भी कर चुकी थी, और इस वजह से अब उसका आँगन की ड्योडी पार करना भी मना हो चुका था| अब रम्या थी और उसकी कोख में पलती यह निशानी, एक उम्मीद थी इस बस्ती की, कि शायद अब गाँव-मालिक के उनके प्रति बर्ताव में कोई फर्क आ जाए, उम्मीद ऐसी जैसी कि सूखे में पानी को तरसते किसान सूख चुके अम्बर में कहीं गलती से प्रकट होने वाले बादल के लिए रखता है| रम्या को भी उम्मीद थी, ऐसे लाल के प्रकट होने कि जो उसके मरुस्थल हो चुके जीवन में सावन कि एक बौछार ले आए, मुझे भी उम्मीद थी कि उसका सपना सच हो, वैसे सपने और वास्तविकता में अन्तर मुझे मालूम है मगर यहाँ स्थिति उम्मीद कि एक डोर सी खींचती मालूम होती थी| चलिये देखते हैं कि दो महीने में क्या होता है, अभी तो मैं भी उस भीड़ में शामिल हूँ, जो यह सोचते हैं कि रम्या उम्मीद से है|
रमुआ उपनाम है रमेश मेहतर का जो आज से आठ महिना पहले ही रात की काली स्याही में कहीं खो चुका है| लोग कहते हैं, सात महिना पहिले गाँव-मालिक और परिवार जनों की नजर बचा कर वो रम्या से मिलके गया है और उसी मिलन की निशानी, उसकी कोख में कभी मिलने और कभी न मिलने वाली सूखी-रोटी के पोषण में पल-बढ रही है| सच क्या है, रम्या भी शायद ही जानती है! सात माह पहले रोटी भूंजने को लकड़ी की तलाश में जंगल गई रम्या को बेहोशी की हालत में गाँव-मालिक के लठैत उसकी कोठरी में पटक गए थे| अब सच जो भी हो, रम्या का ध्यान रखना रमेश के बुढे माँ-बाप का फ़र्ज़ बन चुका था| लाठी टेकती अम्मा और फालिज़ पढने से वाम-अंग से अपंग हो चुके काठी मेहतर ही इस घर की मरजाद बचाए, मेहतरों के इस बस्ती में अपने आँगन में आने वाली एक नई पौध का इन्तेजार राम-राम, राधे-श्याम करते कर रहे थे| तिसपर कमर से झुक चुकी दादी का रोज-रोज आने वाली संतान के बारे में कई प्रश्नों के साथ आँगन बुहारना दिनचर्या बन चुका था|
रम्या अपने कोख में पलती इस निशानी को गिराने का असफल प्रयत्न भी कर चुकी थी, और इस वजह से अब उसका आँगन की ड्योडी पार करना भी मना हो चुका था| अब रम्या थी और उसकी कोख में पलती यह निशानी, एक उम्मीद थी इस बस्ती की, कि शायद अब गाँव-मालिक के उनके प्रति बर्ताव में कोई फर्क आ जाए, उम्मीद ऐसी जैसी कि सूखे में पानी को तरसते किसान सूख चुके अम्बर में कहीं गलती से प्रकट होने वाले बादल के लिए रखता है| रम्या को भी उम्मीद थी, ऐसे लाल के प्रकट होने कि जो उसके मरुस्थल हो चुके जीवन में सावन कि एक बौछार ले आए, मुझे भी उम्मीद थी कि उसका सपना सच हो, वैसे सपने और वास्तविकता में अन्तर मुझे मालूम है मगर यहाँ स्थिति उम्मीद कि एक डोर सी खींचती मालूम होती थी| चलिये देखते हैं कि दो महीने में क्या होता है, अभी तो मैं भी उस भीड़ में शामिल हूँ, जो यह सोचते हैं कि रम्या उम्मीद से है|
September 25, 2009
Kitchen Express
Which express?
What is it?
Which industry it represents?
Who all are associated with it?
What is it?
Which industry it represents?
Who all are associated with it?
Many question and one simple answer, it is a step towards catering people with the best of the best home made recipes prepared in the most hygienic condition available in the Food & Beverage industry, and even you, yes we all are associated with it. It all started with a little thought keeping in the best interest of a person who is living alone, and needs to be fed exactly the same that s/he was used to.
We are currently a team of 37 people, including staff who are behind the burners trying to prepare delicacies as required from 6:30 am till 10:30 pm and 32 happy clients. We are expecting to open our first restaurant somewhere around January 2010. Kindly do visit our facility to be opened soon and give us all a chance to make you feel at home out of home.
We would love your kindness if you could share, what pampers your taste-buds and how exactly you want your favourites to be served. Please make it a point to let us serve you once and we promise you would find yourself in our express with delicacies time and time again.
I could feel the aroma coming out of the, to be soon launched Kitchen Express. I wish so dearly to cater you at the Kitchen Express. the Express with delicacies....
We are currently a team of 37 people, including staff who are behind the burners trying to prepare delicacies as required from 6:30 am till 10:30 pm and 32 happy clients. We are expecting to open our first restaurant somewhere around January 2010. Kindly do visit our facility to be opened soon and give us all a chance to make you feel at home out of home.
We would love your kindness if you could share, what pampers your taste-buds and how exactly you want your favourites to be served. Please make it a point to let us serve you once and we promise you would find yourself in our express with delicacies time and time again.
I could feel the aroma coming out of the, to be soon launched Kitchen Express. I wish so dearly to cater you at the Kitchen Express. the Express with delicacies....
August 26, 2009
कंजरी की प्यास
इंसानों को अलग-अलग देखना ग़लत बात है, लेकिन कई दफे ऐसा करना पड़ता है! कल शाम को ही एक अलग अनुभव हुआ, मैं और मेरी दुपहिया (रामप्यारी) दोनों मस्त चाल चल रही हवा का आनंद उठाते हुए 'चिल्ला' गाँव से सटी हुई बाईपास सड़क की सांस्थिति पे ऊंट-सवारी का अनुभव ले रहे थे, ना चाहते हुए भी! सड़क सीधी होते हुए भी बलखाती लग रही थी, और एक कर्णभेदी आवाज़ ने कानों को ऐसा भेदा मानो अर्जुन ने आँखें मीचे ही मछली की आँख भेद दी हो|
कर्कश मगर आम बोलचाल की भाषा में सुरीली कही जा सकने वाली, यह शब्द-वाणी एक ही सुर और लय-मुक्त तान में कुछ यूँ पुकारती सी जान पड़ी,
कर्कश मगर आम बोलचाल की भाषा में सुरीली कही जा सकने वाली, यह शब्द-वाणी एक ही सुर और लय-मुक्त तान में कुछ यूँ पुकारती सी जान पड़ी,
घड़ी दो घड़ी को सही, तेरी तड़प जलाती है|
तेरे जुल्फों से बहती हवा, मेरी प्यास बुझाती है||
तेरे जुल्फों से बहती हवा, मेरी प्यास बुझाती है||
इन अल्फाजों ने बताया की आजकल फिल्मी-मुखड़ों में ही नही सड़क पे बैठी कोई कंजरी भी, प्यास बुझाने में पानी की उपयोगिता पर केवल सवाल ही नहीं उठाती, वरन उसकी उपयोगिता को सिरे से ही नकार देती है! काश की यह सच होता और आने वाले पचास वर्षों में पेय-जल की समस्या का रूमानी ही सही मगर कोई हल तो निकल आता| हम तो प्यास का एक ही मतलब समझते हैं और वो है गला तर करने से, भले पानी से या फ़िर दारु से! लेकिन कंजरी के शब्दों ने प्यास को एक नया ही रुख दे दिया है, और फ़िर क्या था! हम भी वहीँ आसन जमा बैठ गए, और एक साठ का नोट कंजरी को थमा शाम ढले लग आई प्यास भुझाने की जुगत में पारंगत हो चुकी अपनी शैली को निपुणता से प्रयोग कर, अपनी और कंजरी की प्यास बुझाने में सफल होकर, अपने दस गुना आठ की कोठरी की ओर अग्रसर हुए!
लेकिन तृप्ति का जो अनुभव मुझे हुआ, वैसा शायद कंजरी को ना हुआ था, क्यूंकि मेरे उठते ही और मेरी रामप्यारी से भटर-भटर की कर्ण-प्यारी आवाज़ सुनते ही, उसने फ़िर वही राग छेड़ दिया और उसकी आवाज़ पहले की भाँती ही सड़क पर चलते हर प्यासे को अपनी ओर खींचने के क्रम में लग चुकी थी ओर फ़िर वही बोल, हवा में लहराने लगे थे!
लेकिन तृप्ति का जो अनुभव मुझे हुआ, वैसा शायद कंजरी को ना हुआ था, क्यूंकि मेरे उठते ही और मेरी रामप्यारी से भटर-भटर की कर्ण-प्यारी आवाज़ सुनते ही, उसने फ़िर वही राग छेड़ दिया और उसकी आवाज़ पहले की भाँती ही सड़क पर चलते हर प्यासे को अपनी ओर खींचने के क्रम में लग चुकी थी ओर फ़िर वही बोल, हवा में लहराने लगे थे!
घड़ी दो घड़ी को सही, तेरी तड़प जलाती है|
तेरे जुल्फों से बहती हवा, मेरी प्यास बुझाती है||
तेरे जुल्फों से बहती हवा, मेरी प्यास बुझाती है||
August 24, 2009
ना कहते ही नहीं बनता!!!
आज एक नया अनुभव हुआ, भइया की हम 'हाँ' कह ही नहीं पाते, और हमसे 'ना' कहते ही नहीं बनता! आज सड़क किनारे अपनी खाट तोड़ते हुए यह अनुभव हुआ और ऐसा होना लाजिमी, कुछ यूँ हुआ, कि न हम 'हाँ' कह सके और न ही 'ना'....
तो हुआ कुछ यूँ कि, हम गुमटी पे अपनी चैतन्य मुद्रा में यानी की, झपकी लगाते हुए कुछ सोच रहे थे और मुआ शुक्ला आ टपका कहीं से, मानो आसमान में विचरते पक्षी-गण निशाना साध कर ही त्याज्य-योग्य पदार्थों की बारिश कर रहे हों! और लो शुक्ला बोले की गुरु आज तो सुबह-सुबह ही हलक की ऐसी-तैसी हो चुकी है, और अब इसको तर करने की जुगत लगाओ, सीधे शब्दों में कहा जाए तो, दारु की पिनक लग चुकी थी| और पिनक वो भी शुक्ला को, इतनी सुबह... अभी तो ठेके खुलने में भी आधा घंटा शेष था! न तो 'हाँ' कहते बन रहा था और न ही 'ना' कहते!
अभी चंद घड़ी ही गुजरने पायी थी कि देखा तो मातादीन, राजपूत को गलबहियां डाले इधर ही आ रहे थे| लगता है, आज चांडाल चौकडी ( मुरारी के गुजरने के पश्चात् हमारे लिए प्रयोग होने वाला विशेषण, उसके रहते हमको पांडवों के नाम से जाना जाता था) सुबह ही जमने वाली थी और राजधानी क्षेत्र से गुजरने वाले तमाम लोग, हमारे चरित्र-प्रमाण पत्र जो कि इस मोहल्ले में बहुचर्चित था, पे अपनी-अपनी गवाही को और पुख्ता करने वाले थे!
विशेष सूत्रों के हवाले हमारे हाथ, सबकी प्रेयसी यानी कि मदिरा अपने अंग्रेजी अवतार में प्यालों में समायी प्रस्तुत हो चुकी थी और हम उसको होंठों से लगा अमर करने के उपक्रमों में लग चुके थे| कल्लू भी बीच-बीच में अपनी उपस्थिति, चखने कि थाली पे दर्ज करा जाता था! और हम अपनी चिरंजीवी तटस्थता के साथ न 'हाँ' कह सके और न ही 'ना'.....
अब सोचिये जरा यह भी कोई बात हुई, कि सुबह-सुबह यार-दोस्त आ धमके और हम, कच्ची-पक्की, देसी-विदेशी ले बैठे और कर लिया सत-सत राम-राम, नेपथ्य से आवाज आती है, राम-राम है जी! मनोहर है, जो अपनी गुमटी पे आनेवाले नए लोगों कि फेहरिस्त में हाल-फिलहाल ही शामिल हुआ है! और आते ही बोले कि, गुरु-दो हजार रुपयों कि सख्त जरुरत है, फिर वही हुआ, न 'हाँ' कह सके और न ही 'ना'..... और शुक्ला ने आव देखा न ताव और टपा-टप गिन दिए दो हजार... अभी पिछली बार के दो सौ रुपये तो आए नहीं, दो हजार किस रास्ते आयेंगे... रास्ता खोदना पड़ेगा और फिर वही मोहल्ले वाले कहेंगे कि इस चंडाल चौकडी का काम फिर शुरू हो गया, इस तरह अपने रुपये-पैसों को वापिस लेने कि प्रक्रिया को लोग-बाग़ झगडे और दंगे का नाम दे देते हैं, और हम भी अपनी आदतानुसार न उसको 'हाँ' के रूप में और न ही 'ना' के रूप में स्वीकार कर पाते हैं!
कुल मिला के बुजुर्ग जनता हमें बिगडेल या छुट्टे सांडों के विशेषणों से अलंकृत करती है, मोहल्ले कि भाभियाँ हमारे अन्दर के झूझते नौजवान को देख इठलाती हैं, छोटे बच्चे हमें आदर्श मानते हैं, और कोमलांगी नव्योवनाएं हमारे अन्दर आशिक खोजती फिरती हैं और हम वही, कभी भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से एक बात के पक्ष म नहीं हो पाते..... बस इतना जानते हैं!
तो हुआ कुछ यूँ कि, हम गुमटी पे अपनी चैतन्य मुद्रा में यानी की, झपकी लगाते हुए कुछ सोच रहे थे और मुआ शुक्ला आ टपका कहीं से, मानो आसमान में विचरते पक्षी-गण निशाना साध कर ही त्याज्य-योग्य पदार्थों की बारिश कर रहे हों! और लो शुक्ला बोले की गुरु आज तो सुबह-सुबह ही हलक की ऐसी-तैसी हो चुकी है, और अब इसको तर करने की जुगत लगाओ, सीधे शब्दों में कहा जाए तो, दारु की पिनक लग चुकी थी| और पिनक वो भी शुक्ला को, इतनी सुबह... अभी तो ठेके खुलने में भी आधा घंटा शेष था! न तो 'हाँ' कहते बन रहा था और न ही 'ना' कहते!
अभी चंद घड़ी ही गुजरने पायी थी कि देखा तो मातादीन, राजपूत को गलबहियां डाले इधर ही आ रहे थे| लगता है, आज चांडाल चौकडी ( मुरारी के गुजरने के पश्चात् हमारे लिए प्रयोग होने वाला विशेषण, उसके रहते हमको पांडवों के नाम से जाना जाता था) सुबह ही जमने वाली थी और राजधानी क्षेत्र से गुजरने वाले तमाम लोग, हमारे चरित्र-प्रमाण पत्र जो कि इस मोहल्ले में बहुचर्चित था, पे अपनी-अपनी गवाही को और पुख्ता करने वाले थे!
विशेष सूत्रों के हवाले हमारे हाथ, सबकी प्रेयसी यानी कि मदिरा अपने अंग्रेजी अवतार में प्यालों में समायी प्रस्तुत हो चुकी थी और हम उसको होंठों से लगा अमर करने के उपक्रमों में लग चुके थे| कल्लू भी बीच-बीच में अपनी उपस्थिति, चखने कि थाली पे दर्ज करा जाता था! और हम अपनी चिरंजीवी तटस्थता के साथ न 'हाँ' कह सके और न ही 'ना'.....
अब सोचिये जरा यह भी कोई बात हुई, कि सुबह-सुबह यार-दोस्त आ धमके और हम, कच्ची-पक्की, देसी-विदेशी ले बैठे और कर लिया सत-सत राम-राम, नेपथ्य से आवाज आती है, राम-राम है जी! मनोहर है, जो अपनी गुमटी पे आनेवाले नए लोगों कि फेहरिस्त में हाल-फिलहाल ही शामिल हुआ है! और आते ही बोले कि, गुरु-दो हजार रुपयों कि सख्त जरुरत है, फिर वही हुआ, न 'हाँ' कह सके और न ही 'ना'..... और शुक्ला ने आव देखा न ताव और टपा-टप गिन दिए दो हजार... अभी पिछली बार के दो सौ रुपये तो आए नहीं, दो हजार किस रास्ते आयेंगे... रास्ता खोदना पड़ेगा और फिर वही मोहल्ले वाले कहेंगे कि इस चंडाल चौकडी का काम फिर शुरू हो गया, इस तरह अपने रुपये-पैसों को वापिस लेने कि प्रक्रिया को लोग-बाग़ झगडे और दंगे का नाम दे देते हैं, और हम भी अपनी आदतानुसार न उसको 'हाँ' के रूप में और न ही 'ना' के रूप में स्वीकार कर पाते हैं!
कुल मिला के बुजुर्ग जनता हमें बिगडेल या छुट्टे सांडों के विशेषणों से अलंकृत करती है, मोहल्ले कि भाभियाँ हमारे अन्दर के झूझते नौजवान को देख इठलाती हैं, छोटे बच्चे हमें आदर्श मानते हैं, और कोमलांगी नव्योवनाएं हमारे अन्दर आशिक खोजती फिरती हैं और हम वही, कभी भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से एक बात के पक्ष म नहीं हो पाते..... बस इतना जानते हैं!
तू जो कहेगा वही होगा, या रब...
चाह है कि मिटती नहीं हासिलों से॥
मिला देना मिटटी में मुझे किसी रोज...
हमारी क्या हस्ती, कि हम ना नहीं कह पाते!
चाह है कि मिटती नहीं हासिलों से॥
मिला देना मिटटी में मुझे किसी रोज...
हमारी क्या हस्ती, कि हम ना नहीं कह पाते!
August 19, 2009
IT NEEDS TO BE RELAID....
I love to walk and run, basic idea is to keep moving, cos certain momentum is required for you to know that something inside you, wants you to keep moving, in whatever direction it may be...
Here comes an issue, in which direction one should move to establish the very basic idea of being born and to prove in some or other way of your otherwise unknown existence...
I wandered here and there, tried running away but came face to face to this fact that nothing can take me away...... Away from this mad rush of coming over each other and feeling elated for a few moments, is this the life that we all want for ourselves...
Something somewhere needs to be changed, some trust needs to reappear from somewhere, something needs to be relaid.......
Here comes an issue, in which direction one should move to establish the very basic idea of being born and to prove in some or other way of your otherwise unknown existence...
I wandered here and there, tried running away but came face to face to this fact that nothing can take me away...... Away from this mad rush of coming over each other and feeling elated for a few moments, is this the life that we all want for ourselves...
Something somewhere needs to be changed, some trust needs to reappear from somewhere, something needs to be relaid.......
Moving ahead was the only thing,
I could remember,
I haven't learned else anything,
seen it on murals, walls & paintings,
it was everywhere where I could think,
the race was on since the birth,
and way before I could see myself in,
What if I like to walk and not run?
I prefer to be myself at times!
The road have many on it already running,
but have I ever consented my life,
for being looked after by others for my well being,
Why do I get disturbed with people?
They should know I am not running!!!
A path does requires to be mend,
patches needs to be refilled,
I love to work at the roots,
to bring fresh air to be taken to the shoots,
the road is not complete till one reaches!!
Their Destination!
The road of life requires some work,
I need to join few others,
some company is desperately needed,
at the very basic level where this all works,
I have ran a lot on this road!!
But now,
it needs to be relaid.....
I could remember,
I haven't learned else anything,
seen it on murals, walls & paintings,
it was everywhere where I could think,
the race was on since the birth,
and way before I could see myself in,
What if I like to walk and not run?
I prefer to be myself at times!
The road have many on it already running,
but have I ever consented my life,
for being looked after by others for my well being,
Why do I get disturbed with people?
They should know I am not running!!!
A path does requires to be mend,
patches needs to be refilled,
I love to work at the roots,
to bring fresh air to be taken to the shoots,
the road is not complete till one reaches!!
Their Destination!
The road of life requires some work,
I need to join few others,
some company is desperately needed,
at the very basic level where this all works,
I have ran a lot on this road!!
But now,
it needs to be relaid.....
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