January 12, 2015

लुल्ल का गणित

एक लुल्ल + एक और लुल्ल = एक जोड़ा लुल्ल
एक लुल्ल - एक लुल्ल = बत्ती गुल्ल (*बहुत बड़े लुल्ल हो यार, लुल्ल में कुछ होता ही कहाँ है घटाने को)
एक लुल्ल * एक और लुल्ल = केवल एक ही लुल्ल (देंगे एक चमाट जोर से 'इनफाइनाइट' * 'इनफाइनाइट' का होत है तनिक बताइये तो)

एक लुल्ल / एक लुल्ल = तनिक बुझने में मदद कीजियेगा...



***फुल्टू लुल्ल कर दिए टाइम का, इस लुल्ल सी गणितीय सारिणी के रचैता हैं - हाँ, इसी गोला के प्राणी हैं! 

July 7, 2013

दिल में मेरे है दर्दे-डिस्को... दर्दे-डिस्को, दर्दे-डिस्को...


दिल में मेरे है दर्दे-डिस्को... दर्दे-डिस्को, दर्दे-डिस्को...

नींद भगाने के लिए अलार्म की यह धुन ही काफी है, बाकी 'मलायका' का लहराना नींद को भगाने के लिए अब बहुत बड़ा तोड़ तो नहीं, परन्तु अब तक तो कारगर सिद्ध रहा है। आज तो बहुत पहले ही नींद खुल गयी और शरीर में दर्द रात का सबब कह रहा था... उमस भरी चिप-चिपी रात शरीर को कतई मरोड़ देती है बस... और पौ फटते-फटते आदमी चित्त! 

गुलज़ार के होटल की रोटियाँ चबाने के लिए भी जुगत लगानी पड़ी कल और यह तब जब एक कटोरा भर कर मूंग की दाल मयस्सर थी... समझ नहीं आता, कल काहे इतना खर्च कर दिये रहे, भोज तो था नहीं कोई... पर हाँ मन था, और अब खर्च हो गया तो हो गया!

यहाँ याद आती है, रानी की... उसका दिल लगाकर चूल्हे पर रोटियाँ बना कर गरमा-गर्म खिलाना और फिर प्यार से कहना, खा लो, दिन-रात इतनी हाड़-तोड़ मेहनत जो करते हो... उसका यह कहते-कहते पलकों को छिपाना और कनखी से देखना और फिर बस तुरंत ही एक रोटी की गुज़ारिश और कर, चूल्हे में ठीक तैयार रोटी, दिन में बिलोये मक्खन के साथ थाली में, किसी ना-नुकुर से पहले ही हाज़िर कर देना बस उसके ही बस की बात थी।

दिल करे ना करे डिस्को.. मन तो कर ही रहा होता था। तुम भी कुछ खा लो कहने पर वो कहती थी... खा लेंगे पहले दूध लगा दें चूल्हे पर, मंदा गर्म हो जाएगा रोटी खा चुकने तक। मैं बैठा एकटक उसको ही देखा करता, कोयलों पर दूध और सीने में दिल दोनों ही साथ-साथ तपिश को थामने की कोशिश करते से प्रतीत होते। उसकी आँख से कुछ भी छुपा ना था, तुरंत लोटा हटा देती कोयलों से और राख़ पर रख देती, दूध तो संभल ही गया था! रानी के रोटी खा कर चूल्हा-बर्तन निपटाने में यहीं कुछ समय लगता था और फिर एक आवाज आती थी, आ जाओ सो जाओ, फिर सुबह जल्दी जो उठ जाते हो... देसी गुड की एक डली और तांबे का दो हाथों में ना समाने वाले गिलास में दूध को जज्ब करना बाकी होता था... थोडा तुम भी पी लो कहने पर कहती थी, मैं कौन सा कमजोर हुई जा रही हूँ और फिर ढेर मनौती कर गुजरने पर अंत में थोडा सा दूध पी ही लेती थी, दूध भी कमाल की चीज है, गले से नीचे उतर कर भी उबलने को तैयार और फिर कुछ देर गल-बहियाँ और फिर... और फिर उसका कहना रात काफी हो गयी है, सो जाओ! बस, यही मानो आखिरी बात होती और फिर दोनों ही खर्च सी हो चुकी रात में पूरी आकाशगंगा में एक अकेले तारे को टटोलते से सो जाते...

क्या बात थी उन रातों में, आज मन केवल राग 'मुद्रा' पर नृत्य करता है... चलें अब कुछ समय में हमारे डिस्को का समय हो गया है, दफ्तर से गाड़ी आती ही होगी। और फिर हमारा फ़ोन बजने लगेगा... दिल में मेरे है दर्दे-डिस्को.... दर्दे-डिस्को, दर्दे-डिस्को  

June 20, 2013

और फिर मौन संवाद

कुछ नहीं से कुछ सही, और फिर, कुछ ही क्यों सही? सब कुछ सही क्यों नहीं? 

कुछ नहीं से सब कुछ क्यों नहीं, तक का सफ़र बस कुछ ही पलों में तय हो जाता है! और सामने होती है एक अनंत यात्रा, क्या यह केवल मौन से कट जायेगी? तुम जानती हो, एक पुष्ट संवाद के लिए, एक आत्मीय संवाद का स्थापित होना जरुरी होता है, तर्क और दृष्टिकोण किसी भी संवाद को केवल मेरे या मुझ तक ही सीमित कर देते हैं... तुम्हारे साथ किसी भी संवाद का अंत यदि मौन में हो तो क्या उसे संवाद कहा जाए?

मैं आज भी उसी लम्हे में हूँ जहाँ हमने उस संवाद को छोड़ा था.... ख़ामोशी के साथ, इस धीर से मौन में खोज रहा हूँ, उस ध्वनि प्रारूप को, उस शब्द को जो इस मौन को, इस अनंत ख़ामोशी को चीर कर रख देगा, उस अनहद ध्वनि बिम्ब की प्रतीक्षा में... जो इस चिरकाल के मौन को पुनः: जिवंत करेगा, आत्मीय निवेदन है... कोई नयी धुन छेड़ दो अब... कुछ कहकर इस सुसुप्त हो चुकी यात्रा को पुनर्जागृत कर दो! 


चेतन से अवचेतन हो चुकी इस पथ हीन, कान्तिविहिन, यात्रा में एक यही सोच तो साथ है, कि कहीं तुम हो, प्राण हैं, अभी समय शेष है… तो फिर क्यों रितुम्भरा जल मग्न होकर भी प्यासी है, क्या है जो तृप्त नहीं है, क्या है जो रोकता है, किस आवेग से भयभीत हो… इस अनजाने डर से की कहीं कुछ और मंतव्य तो नहीं। क्या मेरे ह्रदय में किसी भी और मंतव्य के लिए जगह शेष है? बह चलो और पाओगी की अनजाना भय एक कल्पना अतिरेक से अधिक कुछ भी नहीं, इस अनन्त मौन को अनहद की गूंज से छिन्न-भिन्न कर दो। 

उस अवस्था में लौट आना जहाँ कुछ न होकर भी सब कुछ प्रारंभ होता है, जहाँ तृप्ति हर दिशा में समायोजित है, जहाँ केवल एक मत न होकर, एक दृष्टिकोण न होकर भी, सब कुछ एकरस हो, जहाँ संगीत हो और साथ ही अनहद मौन भी, कुछ न होकर भी कुछ हो, तुमको ह्रदय से आमंत्रित करता हूँ और फिर सर्वस्व होगा इस अनहद मौन संवाद मे… 

टी सी के


April 6, 2012

BORN JUST NOW, JUST RIGHT




BORN JUST NOW, JUST RIGHT

I felt a need to quench this thirst,
Holding you close to me as you hug,
Where have you been all this life,
Christen me with your love this moment,
I felt as if I am born just now, just right!

This embrace was something I looked for,
in the womb of mother nature,
waiting for the first breath through your lips,
and here I am standing wide...
I felt as if I am born just now, just right!

I want to breathe on now,
I would attempt to,
I know it would not be the same,
not the same as to breathe through U...
I felt as if I am born just now, just right!

And so are you,
You are loved too...
What could I say to you,
You renewed my faith in loving you...
I would remember this day forever...
I felt as if I am born just now, just right!

BY T.C.K.
6th of April - 2012

July 4, 2011

एक एहसान जो कभी उतार सको 'हम्द' तो कहना

एक एहसान जो कभी उतार सको 'हम्द' तो कहना,
अम्मी के आँचल का तुझपे पड़ती धुप को सहना,
वो नम आँखें जो तेरी खैर की मानिंद थी हर पल,
उन आँखों को सुखा देख तेरी आँखों का गीला होना,
एक एहसान जो कभी उतार सको 'हम्द' तो कहना!
वो तेरी ऊँगली पकड़ के तुझे दरवाजे तक लाना,
वो दो आने की मीठी गुडिया तेरी जिद पे दिला देना,
रस्मो-तीज पे तेरी पसंद से, कभी सेवईं कभी फिरनी बना लेना,
एक एहसान जो कभी उतार सको 'हम्द' तो कहना!
अब्बा को तेरी मर्जी के आगे लाख दफे. समझाना,
मेरा मुन्ना बनेगा राजा किसी रोज, कहके दिल को बहला लेना,
तुझसे दूरी से छितरे दिल को रोज फिर हरा बनाना,
एक एहसान जो कभी उतार सको 'हम्द' तो कहना!
उसकी हर नमाज में तेरे वास्ते दुआ करना,
खुदा का नूर बरसे तुझपे और खुदी का वास्ता देना,
उखड्ती हर सांस पे तुझे फिर याद करना,
एक एहसान जो कभी उतार सको 'हम्द' तो कहना!
बंद होती उस आँख का वास्ता तेरे चेहरे से था हर पल,
यह एहसान जो कभी उतार सको 'हम्द' तो कहना...
एक एहसान जो कभी उतार सको 'हम्द' तो कहना!

June 22, 2011

रमजान पांडे

रात के डेढ़ बजे, कंधे पे गमछा डाले गुसल खाने के बाहर नहाने कि तैयारी... पृष्ठभूमि में बजता मोबाइल पे एक अत्याधुनिक गाना जिसके बोल समझना, रात के इस पहर रमजान पांडे की समझ से बाहर था| बहरहाल गाना बज रहा था और वो सोच में था कि आज गुसल में किस नाजनीन को काल्पनिक मसाज के लिए आमंत्रित किया जाए... तीन बाय चार का गुसल रमजान पांडे के लिए किसी पंचसितारा स्पा केंद्र से कम नहीं, शरीर और मन का मेल दोनों इसी गुसल कि मोरी से जमींदोज जो हो जाता है| इनका तौलिया थोड़ा मटमैला हो चूका है, और इस बार कि सोमवार हाट से नया तौलिया लाने का मन बना चुके इस हाड़-मांस के पुतले को बेसब्री से इन्तेजार है सोमवार का|

सोने का समय हटा दें तो रमजान पांडे एक चालु मशीन कि भांति कार्यरत रहता है... और इस मशीन को फुर्सत मिलना साल में शायद ही कभी होता है और जब पहला साल पूरा होने को आता है, दुसरे साल कि कवायद शुरू हो जाती है|

रमजान पांडे का काम है, खाना बनाना और खाना खिलाना यानि कि 'महाराज' हैं, हमारे रमजान पांडे जी! लेकिन इनकी सबसे बड़ी खासियत है इनकी इमानदारी और इनका भोलापन... यह सभी कार्यों के लिए तत्पर रहते हैं लेकिन इसी वजह से हमेशा व्यस्त रहते है और सात बजते बजते यह भी ढल जाते है... कांच के बोतल भले आधी हो या पूरी इनकी पसंदीदा प्रेमिका है|

सुबह के सात बजते ही इनका मोबाइल मधुर स्वर में राग अलापना शुरू करता है और यह इंसान फिर मुस्तैद हो जाता है, सुबह कि चाय सबसे पहले यही काम इनकी जिम्मेदारी है, रात सोने का कोई समय तय नहीं लेकिन जागना सात बजे ही होता है! फिर दिन भर कभी यह काम तो कभी वो काम... अरे बनाने वाले ऐसा इंसान क्यूँ बनाते हो भाई, जिसकी आधी जिंदगी का सार केवल दिमाग थका देने वाली अभद्र बोलचाल से शुमार हो चूका हो! हैं एक चरित्र इनकी दुनिया में भी, मगर आज तरजीह इनको ही दी जायेगी, मंद-बुद्धि इनका एक सुप्रचलित नाम हो चूका है और अब कभी कभी यह थक भी जाते हैं, लेकिन जिम्मेदारी का बोझा इनको सतत कार्यरत रहने को प्रेरित करता है

दिनांक जुलाई इनका जन्मदिन होता है, इसलिए आज इनको मेरी और से यह सप्रेम भेंट है, भाई कुछ अधिक तो कर नहीं सकता आपके लिए, मगर आपको आज अजर-अमर करने जा रहा हूँ मै चाहूँगा कि अगले जन्म में मेरे सगे बड़े भाई के तौर पे जन्म लें आप ताकि आपकी कुछ सेवा कर सकूँ, इस जन्म में तो आप करने नहीं देंगे! मेरा साथ निभाने के लिए हार्दिक धन्यवाद!

November 13, 2010

और बस बदल गयी जिन्दगी!

क्या कहें कि हर सुबह एक रात के बाद आती है, और हर सुबह से पहले एक रात होती है| आज कि सुबह कुछ ऐसी है, जो बस हमेशा याद रहेगी.... आज का सूरज एक नयी रौशनी लेकर आया और बस जिंदगी बदल गयी! मासूम दिल और नम आँखें और मेरा आइना गवाह रहेंगे मेरी उस मुस्कान का जो गयी रात उकेरे गए सपनो को अपनी गोद में लेकर हमेशा के लिए जा चुकी रात और उनको सुबह विदा करती मेरी उम्मीदों का हासिल थी|

कुछ अपने से और कुछ पराये से खुले बिस्कुट नमी खा चुके थे और आज सुबह कि पहली चाय में घुल रहे थे कुछ इस कदर कि वो चाय के साथ एकसार होकर ही दांत पार करना चाहते थे.... विस्तार कुछ ज्यादा हो जाए और मैं कहीं और से शुरुआत कर के बीत चुकी निशा को डैने दे पाऊं तो मेरी इच्छाशक्ति बेकार-बेरोजगार साबित होगी|

सुबह अपनी छोटी सी कोठरी और मेरी नन्ही दुनिया से आपकी जा चुकी महक को मैं आज आपकी आखिरी निशानी के साथ तिलांजलि दे देना चाहता हूँ| कभी इतना कठोर हृदयी था मैं, लेकिन तुम्हारी हर अदा जो मेरी हमदम थी कल रात, मुझसे बिलकुल सटी हुई तुम्हारी काया शुरूआती शिशिर को मुझसे दूर किये हुए थी| अच्छा ही हुआ कि गयी रात के साथ तुम भी चली गयी, तुम्हारे होंठों से मिले होंठ और उन चुम्बनों की तपिश मुझे झुलसा चुकी सी मालूम होती है| शायद ठीक ही हुआ की तुम रात के अँधेरे में ठीक वैसे ही चली गयी, जैसे अमावास का चाँद गूम सा हो जाता है! मुझे आने वाली पूनम की रात का इन्तेजार इस कदर कभी था! आज की सुबह एक नया हौंसला मिला और कुछ कर गुजरने की चाहत भी, जो मेरे भीतर ही कहीं दबी-छिपी सी हो और शायद तुम्हारे जाने का इन्तेजार कर रही थी, अब अंकुरित होने लगी है और सूरजमुखी के फूल की भाँती ही रौशनी के पीछा करने लगी थी| नर्म और गुनगुनी इस धुप का एहसास कुछ ऐसा था जैसे किसी डूबते नाविक को कहीं दूर जमीन के दिख जाने पर होता हो| तुम्हारे जाने का एहसास इतना हसीं होगा मुझे मालूम था, काश तुम कुछ समय पहले चली गयी होती और मैंने खुद के हौंसलों को इतने करीब से पहले ही जान लिया होता|

एक कहावत है, देर आये दुरुस्त आये! चलिए इस सुबह का लुत्फ़ उठा लें और इस नयी उर्जा को एक अकथनीय आलौकिक रूप देने की शुरुआत कर लें| पिछली रात तुम्हारा जाना और हम बदल गए और बस बदल गयी जिन्दगी!